Monday, July 18, 2016

सावन में शिव पूजा - Shiva Worship in Savan !

ॐ नमः शिवाय। 
ॐ विशुद्ध ज्ञान देहाय त्रिवेदी दिव्य चक्षुषे।
श्रेयः प्राप्ति निमित्ताय नमः सोमार्द्ध धारिणे।। 
   
(मैं अर्द्ध चन्द्र को धारण करने वाले उन भगवन शंकर को नमस्कार करता हूँ जिनका समस्त शरीर ही विशुद्ध ज्ञान है, तीनों वेद ही जिनके दिव्य नेत्र हैं और जो कल्याण प्राप्त करने के साधन हैं)

               शिव कल्याणकर्ता हैं, उनकी आराधना कभी भी की जाय वह कल्याणकारी होती है। वैसे तो शिव आशुतोष हैं अर्थात शीघ्र प्रसन्न होने वाले परन्तु ऐसा विश्वास है की सावन के पवित्र मास में उनकी पूजा शीघ्र फलदायी होती है क्योंकि भोलेनाथ अत्यन्त प्रसन्न होते हैं। सोमवार का दिन शिव पूजा का विशेष दिन होता है परन्तु जब सोमवार सावन का हो तो कहना ही क्या ! 


                  सावन जीव-जंतुओं एवं वनस्पतियों की संख्या में वृद्धि का समय होता है। अतः शिव-भक्त सावन में मांसाहार और साग का भक्षण नहीं करते। हृदय में भक्तिभाव के साथ नित्य शिव का पूजन और यथासम्भव शिव मंदिर को जाना अच्छा लगता है। सावन का सोमवार व्रत सोमवारी के नाम से जाना जाता है। इस दिन शिव-मंदिरों में भक्तों की भीड़ देखते ही बनती है। भक्त यथासम्भव उपवास अथवा फलाहार रखते हुए शिव-पूजन करते हैं। शिव को प्रसन्न करने के लिए शिव को प्रिय वस्तुओं का अर्पण करते हैं। यथा गंगाजल, बिल्व-पत्र (बेलपत्र), अर्क-पुष्प, ध्रुव-पुष्प,  धतूरा, भांग, कनेर, दूर्वा, इत्यादि। 
                       कांवड़ यात्रा सावन में आम बात है। भक्त नदी में स्नान कर दो पात्रों  में जल भरते हैं और पैदल चल कर प्रसिद्ध शिव मंदिरों में अर्पण करते हैं। इस यात्रा में बोल-बम का नारा भक्ति के साथ साथ जोश भी भरता है। स्थानीय तौर पर यह कांवड़ यात्रा सोमवार के दिन अधिक होती है जब भक्त आधी रात को ही नदी स्नान कर कुछ किलोमीटर की यात्रा कर बोल-बम के नारे के साथ जलार्पण हेतु मंदिर पहुँचते हैं। यथा राँची शहर में स्वर्णरेखा नदी में स्नान कर कांवरिये पहाड़ी मंदिर में जल चढ़ाते हैं। परन्तु लम्बी दूरी वाली कांवड़ यात्रा में प्रतिदिन जलार्पण होता है यद्यपि सोमवार को भीड़ विशेष होती है। सबसे प्रसिद्ध कांवड़ यात्रा बिहार के सुल्तानगंज से झारखण्ड के बैद्यनाथधाम तक होती है जो लगभग १०० किलोमीटर है।सुल्तानगंज में गंगा का प्रवाह उत्तर की ओर है अतः यहाँ गंगा-स्नान एवं गंगाजल का बहुत ही विशेष महत्व है जहाँ का जल भोलेनाथ को बहुत प्रिय है। कांवरिये पैदल तो चलते ही हैं और वो भी बिना जूते चप्पल के। प्रतिदिन इनकी संख्या लाखों में पहुँच जाती है।सभी एक दूसरे को बम के नाम से सम्बोधित करते हैं। अधिकांश कांवरिये दो में से एक गंगाजल का पात्र देवघर के बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग पर अर्पण करते हैं जबकि दूसरा वहां से ४० किलोमीटर दूर बासुकीनाथ के नागेश ज्योतिर्लिंग पर। 
                  यहाँ के अतिरिक्त देश के विभिन्न भागों में काँवर यात्राएँ अलग अलग दूरियों के लिए होती हैं। शिव में भक्तों का अपार विश्वास ही है जो सावन में अनेक रूपों में नजर आता है।
                

 सावन में शिव का रुद्राभिषेक विशेष मनोरथों को प्रदान करने वाला होता है। जल, गंगाजल, दूध और गन्ने के रस की शिवलिंग पर अविरल धारा से अभिषेक और रुद्र अष्टाध्यायी का ब्राह्मणों द्वारा निरन्तर पाठ रुद्राभिषेक को पूर्ण करता है। मिट्टी से बनाये गए "पार्थिव शिवलिङ्ग" का भी सावन में अभिषेक किया जाता है। [Parthiv Shivling - पार्थिव शिवलिङ्ग को जानने के लिए यहाँ क्लिक करें।]
                 शिवभक्त प्रातःकाल से ही शिवध्यान और शिवप्रातःस्मरण स्तोत्र का मनन करते हैं। फिर शिवमानस पूजा, शिवपंचाक्षरी स्तोत्र, शिवमहिम्न स्तोत्र, शिवषडक्षर स्तोत्र, रुद्राष्टक, लिंगाष्टक इत्यादि द्वारा शिव-आराधना करते हैं। शिवमहिम्न स्तोत्र के अनुसार :-
महेशान्नापरो देवो     महिम्नो नापरा स्तुतिः। अघोरान्नापरो मन्त्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम्
अर्थात महेश से बड़े कोई देव नहीं, महिम्न स्तोत्र से बड़ी कोई स्तुति नहीं अघोर से बड़ा कोई मन्त्र नहीं और गुरु से बड़ा कोई तत्व नहीं। अघोर शिव को ही कहते हैं। कोई भी मन्त्र अघोर अर्थात शिव से बड़ा नहीं है। इसका अर्थ यह भी कहा जाता है कि अघोर मन्त्र से बड़ा कोई मन्त्र नहीं और "ॐ नमः शिवाय" को ही अघोर मन्त्र भी कहा जाता है। परन्तु शिव की स्तुति हेतु एक अघोर मन्त्र यह भी है, 
ॐ अघोरेभ्योSथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः सर्वेभ्यः।
सर्वशर्वेभ्यो       नमोस्तेSस्तु       रुद्र      रुपेभ्यः।।

(जो अघोर हैं, जो घोर हैं और जो घोर से भी घोरतर हैं, सर्वसंहारकरी रुद्र को मैं सभी रूपों में नमस्कार करता हूँ।)
                इस प्रकार शिव-आराधना करते हुए संध्या पूजन के समय शिवताण्डवस्तोत्र का पाठ एवं शिव की आरती करते हैं। भगवान महादेव से प्रार्थना करते हैं,
ॐ पञ्चवक्त्राणि विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात।

(हम पाँच मुखों वाले महादेव को जाने, उनका ध्यान करें, वे रुद्र हमें सन्मार्ग की ओर  प्रेरित करें।) 
सावन का पवित्र माह हमें सर्वव्यापी, कल्याणकारी परमात्मा शिव के सान्निध्य में जाने का और उनसे जुड़ने का अवसर प्रदान करता है। 
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Wednesday, June 1, 2016

सदगुरु की खोज - Search of a Satguru ! True Guru !

गुरुर्ब्रह्मा    गुरुर्विष्णुः  गुरुर्देवो    महेश्वरः। 
गुरुः साक्षात् परब्रह्मः तस्मै श्री गुरुवे नमः।। 

सतगुरु, सदगुरु 
                      यह गुरु मन्त्र स्पष्ट करता है कि गुरु का हमारे जीवन और संस्कृति में कितना ऊँचा स्थान है।गुरु का शाब्दिक अर्थ है शिक्षक।किन्तु वृहत मायने में गुरु वह है जो हमें सन्मार्ग पर चलने को प्रेरित करे और परम ज्ञान, परम सत्य और परमात्मा को प्राप्त करने का उपाय सिखाए ताकि मानव जीवन प्राप्त करने का हमारा उद्देश्य पूर्ण हो, हमारा उद्धार हो। ऐसे गुरु ही सच्चे गुरु होते हैं जो कहलाते हैं, सत् +गुरु = द्गुरु। लेकिन द्गुरु को पहचानना और पाना आसान नहीं है। आज के इस प्रचार युग में एक से बढ़कर एक बाबा और ज्ञानी नजर आते हैं जो शिष्य की पात्रता जांचे बिना ही थोक के भाव से शिष्य बनाने को तत्पर रहते हैं। इनके बड़े बड़े आश्रम देश विदेश के कई शहरों में फैले होते हैं और इनका संगठन अनुयायियों की संख्या बढ़ाने का हर प्रयास करता है। ये गुरु शिष्यों को तो माया का त्याग करने एवं दान के लिए प्रेरित करते हैं किन्तु स्वयं मायाजाल में फंसे हुए विलासिता का जीवन जीते हैं। यही नहीं कुछ गुरु तो शिष्यों को भगवान की पूजा करने की बजाय स्वयं की ही पूजा करने का आदेश देते हैं और विडम्बना तो देखिये, इसका कारण ऊपर लिखे गुरु मंत्र को ही बताते हैं। कहते हैं जब शास्त्रों में गुरु को ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश माना गया है तो गुरु की पूजा ही त्रिदेव की पूजा है। क्या ऐसे गुरु द्गुरु हो सकते हैं। गुरु -मन्त्र का ऐसा दुरुपयोग !
                गुरु -मन्त्र के शब्दों को नहीं बल्कि इसके भाव को देखना चाहिए। इसका भाव है कि गुरु का स्थान ईश्वर तुल्य है। जितना आदर और भक्ति हमें भगवान पर होता है उतना ही गुरु पर भी हो। क्योंकि गुरु पर विश्वास और गुरु का सम्मान किये बिना हम उस पथ पर बढ़ नहीं सकते जिस पथ पर हमें जाना है। आध्यात्मिक ज्ञान की बात तो दूर साधारण विद्या भी जिस गुरु से सीखें उनके प्रति भी आदर और सम्मान होना आवश्यक है। गुरु के प्रति सम्मान से सम्बंधित एक कहानी याद आ रही है जो वर्षों पहले सुनी थी:-
             "एक राजा के आम के बाग़ में बड़े रसीले और स्वादिष्ट आम लगे थे। राजा रोज उन्हें देख कर खुश होता। पर एक दिन उसे लगा कि कोई चोरी से आम तोड़ रहा है। बाग के बाहर पहरेदार बैठाए पर चोर का पता नहीं चला। उसने स्वयं चोर पकड़ने की सोची। रात भर बाग़ में बैठा रहा कोई न आया। सवेरे जब चलने को सोचा तो बाग़ में झाडूवाला आया। राजा चुपके से पीछे लगा। उसने देखा कि झाड़ूवाले ने कुछ ऐसा किया कि आम लगे ऊपर की डालियां खुद उसके पास झुक गईं और उसने चुनकर सुन्दर आम तोड़े फिर अपने टोकरी में रख लिए। राजा ने उसे पकड़ा तो वह माफ़ी मांगने लगा। राजा एक शर्त पर माफ़ करने को तैयार हुआ यदि अपनी विद्या वह सिखाये। झाड़ू वाला मान गया। कई दिनों तक राजा वह विद्या सीखता रहा पर सीख न पाया। राजा गुस्से में बोला 'तू मुझे सही विद्या नहीं सिखा रहा, मैं तेरा सर कलम कर दूंगा।' झाड़ू वाला बोला,'गलती मेरी नहीं बल्कि आपकी है। जब तक गुरु का सम्मान नहीं करेंगे विद्या सिद्ध नहीं होगी। आप मुझे झाड़ू वाला नहीं, गुरु की तरह देखें तभी सीख पायेंगे।' राजा को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने उसे गुरु माना और विद्या सीख ली।"
             गुरु ईश्वर तुल्य है पर गुरु ईश्वर नहीं है। जब गुरु शिष्य को ईश्वर से मिला देता है तो कृतज्ञ हो कर शिष्य गुरु के पाँव छूता है और कहता है,
गुरु गोविन्द  दोउ खड़े   काको लागों पांय
बलिहारी गुरु आपकी गोविन्द दियो बताय
              स्पष्ट है कि गुरु शिष्य को ईश्वर की ओर ले जाता है, खुद को ईश्वर नहीं बताता। ऐसा ही गुरु द्गुरु होता है। द्गुरु हर किसी को शिष्य बनाने  को तैयार नहीं होता क्योंकि हर शिष्य सुपात्र नहीं होता। पात्र का शाब्दिक अर्थ बर्तन होता है। हम व्यक्ति की तुलना बर्तन से ही करें। अगर हमें दूध लेना है तो सिर्फ हमारे पास बर्तन होना ही काफी नहीं है बल्कि बर्तन का सीधा होना भी चाहिए। बर्तन भी ऐसा हो जिसका मुंह बोतल जैसा संकीर्ण न हो। उसमें छेद न हो।तभी तो यह बर्तन (पात्र) सुपात्र होगा। इसी प्रकार द्गुरु शिष्य बनाने से पहले व्यक्ति में पात्रता देखता है। ज्ञान रूपी दूध प्राप्त करने हेतु शिष्य का सुपात्र होना जरूरी है ताकि ज्ञान रुपी दूध उसके अंदर समा सके। शिष्य बनाने से पहले गुरु शिष्य की पात्रता की परीक्षा भी ले सकता है।  
                बिल्कुल इसी प्रकार व्यक्ति को भी किसी को गुरु बनाने से पहले सोच समझ लेना चाहिए। इसके लिए विचाराधीन व्यक्ति की प्रसिद्धि अथवा प्रचार से प्रभावित नहीं होना चाहिए। न ही भेड़ - चाल चलनी चाहिए। कई बार अपने कुछ परिचित या रिश्तेदार को किसी को गुरु बनाते देख लोग स्वयं भी यही करना चाहते हैं। पर हमेशा यह ध्यान में रखना चाहिए कि गुरु हमारी नौका का मांझी होता है। उसमें इतना सामर्थ्य होना चाहिए कि हमारी जीवन रूपी नौका को सही दिशा दे सके और भवसागर को पार करने में हमारी मदद कर सके। यदि गुरु स्वयं ही कमजोर हो तो शिष्य का क्या उद्धार कर सकेगा ? गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस के प्रारम्भ का तीसरा श्लोक ही इस प्रश्न का उत्तर देता है कि गुरु कैसा हो :-
वन्दे  बोधमयं  नित्यं  गुरुं  शंकर रुपिणम्,यमाश्रितो ही वक्रोsपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते। 


मैं ऐसे ज्ञानमय, अविनाशी गुरु शंकर की वंदना करता हूँ जिनके आश्रित होने के कारण टेढ़ा होने पर भी चन्द्रमा सर्वत्र पूजे जाते हैं। अर्थात जब गुरु इतना समर्थ हो तो शिष्य के अवगुण भी छिप जाते हैं। 
                   ऐसे गुरु शंकर सिर्फ चन्द्रमा के ही नहीं बल्कि सभी देवताओं के भी गुरु हैं। जैसा कि शिव षडक्षर स्तोत्र में वर्णित है, 
यत्र यत्र स्थितो देवः    सर्वव्यापी महेश्वरः।
यो गुरुः सर्व देवानां यकाराय नमो नमः।।
              पर  क्या शिव जैसे गुरु शिष्य बनाने का अभियान चलाते हैं। नहीं, वे तो दुर्गम कैलाश पर्वत के शिखर पर रहते हैं जहाँ हर कोई नहीं पहुँच सकता। कहने का अर्थ यह है की समर्थ गुरु अपना शिष्य बनाने, आश्रम का विस्तार करने और दान के लिए प्रोत्साहित करने के लिए टीवी अथवा अन्य प्रचार का सहारा नहीं लेते। वे तो समाज से अलग अपने ध्यान साधना में लीन रहते हैं। ऐसे गुरु को खोजना पड़ता है। जिन शिष्यों में लगन होती है वे ही सदगुरु तक पहुँच पाते हैं। जो सदगुरु समाज के अंदर रहते भी हैं वे एक साधारण जीवन व्यतीत करते हैं, आडंबर एवं विलासिता से दूर  रहते हैं। वे वैसे ही शिष्यों को अपनाते हैं जो सुपात्र हों।  इसका एक उदहारण स्वामी योगानंद की प्रसिद्ध पुस्तक "एक योगी की आत्मकथा" से लिया जा सकता है। स्वामी जी के गुरु युक्तेश्वर महाराज और उनके भी गुरु लाहरी महाशय समाज में रहते हुए एक साधारण व्यक्ति का जीवन बिताते थे। लाहरी महाशय तो परम योगी थे। उनके कई शिष्य भी बड़े पहुँचे हुए बने। पर लाहरी महाशय के गुरु 'महावतार बाबाजी' तो समाज से दूर हिमालय में विचरते थे। उन्हें तो कोई खोज भी नहीं सकता था। वे तभी किसी से मिलते थे जब वे स्वयं चाहते थे। लाहरी महाशय भी तभी उनके शिष्य बने जब 'महावतार बाबाजी' ने चाहा। गुरु ने अपने प्रताप से ऐसी परिस्थितियाँ पैदा कर दीं कि लाहरी महाशय को अनजाने में ही हजारों किलोमीटर दूर हिमालय की गोद जाना पड़ा और गुरु ने दर्शन दिए।
                   आज भी ऐसे सदगुरु हैं जो दिखावे से दूर रहते हुए समाज के बीच में हैं और अपने शिष्यों का उपकार करते हैं। और ऐसे पहुंचे हुए ज्ञानी भी हैं जो समाज से दूर हिमालय में एकांतवास करते हुए साधना करते हैं। जिन लोगों को उनकी तलाश होती है, सच्चे हृदय से तलाशने पर मिल सकते हैं। जरूरत है ऑंखें खुली रखने की ताकि उनकी पहचान हो सके।
                   ऐसी ही एक संस्था के सदस्य से मैं मिला हूँ। वर्षों साथ रहने के बावजूद उन्होंने इसके बारे में मुझसे कभी नहीं कहा परन्तु जब उन्हें यह पता चला कि मेरा भी अध्यात्म की ओर झुकाव है तभी इसके बारे में चर्चा की। कारण यह कि इस संस्था को अपने सदस्यों की संख्या बेहिसाब बढ़ाने में दिलचस्पी नहीं और न ही अनेक नए आश्रम देश भर में बनाने का उद्देश्य है। आज भी इसका एक मात्र आश्रम गुरु के पुश्तैनी माकान में है। प्रति वर्ष किसी एक शहर में भंडारे का आयोजन होता है जिसमें सभी सदस्य उत्साह के साथ भाग लेते हैं। आयोजन हेतु बाहर वालों से चन्दा नहीं लिया जाता बल्कि सभी सदस्य आपस में ही चन्दा करते हैं। यह चन्दा भी असीमित नहीं होता बल्कि इसकी एक सीमा निश्चित की जाती है यथा रु २०००/- से २००००/- . यह इसलिए ताकि जहाँ तक हो सके सभी सदस्य भागीदार बनें।इसी में अलग सत्र होता है जिसमें  गुरु द्वारा प्रवचन एवं शिक्षा दी जाती है। भंडारे के बाद सभी सदस्य वापस घर आते हैं और गुरु के निर्देश के अनुसार प्रतिदिन साधना करते हैं। ऐसे ही गुरु को सदगुरु कहा जा सकता है और गुरु -मंत्र की कसौटी पर परम आदरणीय होते हैं।  
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Tuesday, May 10, 2016

देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमारों की अदभुत कथा (The great doctors of Gods-Ashwinikumars !)-भाग -4 (चिकित्सा के द्वारा अंधों को दृष्टि प्रदान करना)

One of the Shloka of Rigved praising Ashwinikumrs
                  पिछले ब्लॉगों (भाग-१ ; भाग २ ;भाग ३) में हमने देखा कि परोपकारी अश्विनीकुमारों ने किस प्रकार वृद्धों को युवावस्था प्रदान किया। उन्होंने कई दृष्टिहीन लोगों पर दया कर उन्हें दृष्टि भी प्रदान किया। उपमन्यु का उदाहरण उल्लेखनीय है। 
                 एक बार उपमन्यु गुरु की आज्ञा से किसी कार्यवश जंगल गए। न जाने क्यों उन्होंने आक के पत्ते खाये। इससे उनके पेट में भीषण जलन होने लगी और कुछ देर में उनके आँखों की ज्योति चली गयी। अंधे हो जाने के कारण वे एक कुँए में गिर पड़े। शाम को जब वे आश्रम पर नहीं पहुँचे तो गुरु धौम्य चिंतित हुए। फिर स्वयं ही उपमन्यु का नाम पुकारते जंगल में गए। जब उपमन्यु ने सुना तो कुँए से ही आवाज़ दी,"गुरूजी, मैं कुँए में गिर पड़ा हूँ। स्वयं निकल नहीं सकता।" गुरु धौम्य ने जब जाना की आक के पत्ते खाने से इसकी आँखें ख़राब हो गई हैं तो उन्होंने उपमन्यु से कहा,"तुम दयालु और परोपकारी अश्विनीकुमारों की स्तुति करो। वे ही तुम्हारा कल्याण कर सकते हैं। "
                   गुरु की आज्ञा से उपमन्यु ने ऋग्वेद के मन्त्रों से अश्विनीकुमारों की स्तुति की। मनोहर स्तुति सुन कर अश्विनीकुमार शीघ्र ही पधारे। उन देवों ने उपमन्यु को सांत्वना दी और कहा,"उपमन्यु ! तुम ये पुआ खा लो।" किन्तु कष्ट में होने पर भी उपमन्यु अपने संस्कार नहीं भूले थे। उन्होंने उत्तर दिया कि ब्रह्मचारी होने के कारण बिना गुरु को निवेदन किये वे पुआ नहीं खा सकते। अश्विनीकुमार उनकी गुरु-भक्ति से बहुत प्रसन्न हुए। उन देव-वैद्यों ने न सिर्फ उपमन्यु को पुनः दृष्टि प्रदान की बल्कि उसके दाँत सोने के बना दिए। इतना ही नहीं, उसी क्षण सारे वेद और धर्मशास्त्र उसकी बुद्धि में डाल दिए। 
Sukta of  Rigved
                  अन्य उदहारण ऋज्राश्व का है। ऋज्राश्व ने १०० भेड़ें खाने के लिए भेड़िये को दे दीं। इससे क्रुद्ध हो कर उसके पिता ने उसे दृष्टिहीन कर दिया। जब ऋज्राश्व भी अश्विनीकुमारों की शरण में गए और उनकी स्तुति की तो अश्विनीकुमारों ने उनपर कृपा कर उन्हें पुनः दृष्टिवान बन दिया। 
                   इसी प्रकार कण्व ऋषि की भी कथा है। असुर ऋषियों पर अत्याचार करते रहते थे। एक बार कण्व ऋषि भी असुरों के कहर का शिकार हो गए। न सिर्फ ऋषि को प्रताड़ित किया बल्कि आग में उनकी आँखें भी झुलसा दीं। इससे वे अंधे हो गए थे और कुछ भी देख नहीं पाते थे। जब उनका कष्ट असहनीय हो गया तो अश्विनीकुमारों की शरण में गए।अश्विनीकुमारों को उन पर दया आ गयी और उन्होंने कण्व ऋषि के आँखों की भी चिकित्सा की और पुनः उनकी दृष्टि वापस लौटाई। 
                 कवि नामक व्यक्ति की भी आँखों की ज्योति अश्विनीकुमारों की कृपा से पुनः वापस हुई थी। ये उदहारण ऋग्वेद में उल्लिखित हैं। 
                 ऋग्वेद में ही वधृमति नामक सती महिला का भी प्रसंग है जो पुत्र के न होने से अत्यन्त दुखी रहती थी। अश्विनीकुमारों की दयालुता ज्ञात होने पर वह भी उनकी शरण में गयी। अपनी ख्याति के अनुरूप ही अश्विनीकुमार-द्वय ने वधृमति पर भी कृपा की और उसे "हिरन्यहस्त" नामक अतिसुन्दर और योग्य पुत्र प्रदान किया। 
                  वेदों और पुराणों में अश्विनीकुमारों का उल्लेख एक दक्ष शल्य चिकित्सक (सर्जन) के रूप में मिलता है जो न सिर्फ दयालु, परोपकारी एवं करुणा करने वाले देवता हैं बल्कि दक्ष-प्रजापति से प्राप्त आयुर्वेद की विद्या का जनहित के लिए व्यापक उपयोग किया। इनके आवाहन, स्तुति तथा कई कृत कार्यों का विवरण ऋग्वेद के सूक्त ११७ से १२० तक में देखे जा सकते हैं।   
                  वैदिक काल में अश्विनीकुमारों की बहुत ही लोकप्रियता थी।वेदों को ज्ञान का भण्डार कहा गया है। आज लोग उस ज्ञान को भूलते जा रहे हैं। वेदों से प्रेरणा ले कर हम भी उनकी आराधना करें। शारीरिक एवं मानसिक कष्ट के समय दयालु सूर्य पुत्र अश्विनीकुमारों का स्मरण और स्तुति शुभ फलदायक है। 

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