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Thursday, July 28, 2016

क्या सतयुग में पहाड़ों के पंख हुआ करते थे ?

Flying Mountains-उड़नेवाले पर्वत /पहाड़ों के पंख 
                  यह बात विचित्र लगती है कि पहाड़ों के पंख हो सकते हैं और वे उड़ भी सकते हैं | ऐसी कपोल कल्पनाएँ हमने फिल्मों में ही देखी हैं | प्रसिद्ध हॉलीवुड फिल्म अवतार में हमने हवा में तैरते पर्वतों को देखा है पर उसके पीछे कुछ अलग ही वैज्ञानिक सिद्धांत दिए गए हैं पर धार्मिक पुस्तकों में पंख वाले पर्वतों का वर्णन मिलता है जो सजीव की भांति उड़ सकते थे |ऐसा ही एक प्रसंग महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण के सुन्दरकाण्ड में मिलता है जब हनुमान द्वारा समुद्र लंघन किया जा रहा होता है | भगवान श्री राम के कार्य के लिए हनुमान को समुद्र लंघन करते देख स्वयं समुद्र ने मैनाक नामक पर्वत से अनुरोध किया कि वह हनुमान को अपने ऊपर कुछ समय विश्राम करने को कहे | बाबा तुलसीदास ने रामचरित मानस में इस प्रसंग को बहुत संक्षेप में इतना ही लिखा है,



जलनिधि रघुपति दूत विचारी | तैं मैनाक होहु श्रम हारी ||

हनूमान तेहिं परसा कर पुनि कीन्ह प्रणाम,
राम काज कीन्हें बिना   मोहे कहां विश्राम |




(अर्थात समुद्र ने हनुमान को श्री राम के दूत जान कर मैनाक से कहा कि तुम हनुमान जी के श्रम को दूर करो , उन्हें विश्राम दो किन्तु हनुमान जी ने मैनाक को छूकर उन्हें प्रणाम किया और उनके अनुरोध को अस्वीकार करते हुए कहा कि जबतक श्री राम जी के कार्य को पूरा न कर लूँ मैं विश्राम न कर पाउँगा |)
                     पर महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में इस प्रसंग को थोड़ा विस्तार से लिखा है | समुद्र ने सोचा कि भगवान श्री राम के पूर्वज इक्ष्वाकुवंशी सगर महाराज तो मेरी उन्नति करने वाले थे अतः इस समय राम जी के दूत की सहायता करना मेरा कर्तव्य है | यह सोचकर उन्होंने स्वर्ण की चोटी वाले मैनाक के पास जाकर कहा,"हे गिरिवर ! देवराज इंद्र ने तुम्हें पातालवासी असुरों को उपर आने से रोकने के लिए एक परिघ की तरह स्थापित कर रखा है इसी से तुम असीम पाताल का द्वार रोके रहते हो | तुम सीधे तिरछे उपर नीचे किसी भी तरफ बढ़ सकते हो | अतएव हे पर्वोत्तम ! मैं तुमसे कहता हूँ कि तुम उपर उठो | देखो ये बलवान हनुमानजी तुम्हारे उपर पहुँचना ही चाहते हैं |मैं इक्ष्वाकुवंशियों का हितैषी हूँ, अतः मेरा यह कर्तव्य है कि मैं इनकी कुछ सहायता करूँ। तुम हनुमानजी के श्रम को हरने के लिए ऊपर उठो।" 
                       तब स्वर्णिम शिखरवाला बड़े बड़े वृक्षों और लताओं से युक्त मैनाक पर्वत समुद्र के जल को चीर कर वैसे ही ऊपर उठा जैसे मेघों को चीर कर सूर्यदेव उदय होते हैं। उस समय सौ सूर्यों की तरह पर्वतश्रेष्ठ मैनाक की शोभा हुई। तेजी से विशालकाय पर्वत को सामने उठे हुए देखकर हनुमानजी ने सोचा कि अचानक कोई विघ्न उपस्थित आ खड़ा हुआ है। अतः उन्होंने छाती की ठोकर से मैनाक को समुद्र के भीतर ठेल दिया। मैनाक उनके बल और वेग को देख कर बहुत प्रसन्न हुआ, वह पुनः ऊपर उठा और गर्जा। फिर मानव रूप धारण कर अपने पर्वत पर खड़ा हो कर आकाश में स्थित हनुमानजी से प्रसन्न एवं प्रेमपूर्वक बोला -"हे वानरोत्तम !यह तुम बड़ा ही कठिन कार्य करने को उद्धत हुए हो। अतः तुम थोड़ी देर मेरे वृक्षों से स्वादिष्ट एवं सुगंधयुक्त फलों और कंद मूलों को खाकर मेरे श्रृंग पर ठहरकर विश्राम कर लो फिर सुखपूर्वक आगे चले जाना।इक्ष्वाकुवंशियों का कृतज्ञ यह समुद्र श्री रामजी के हितसाधन में लगे आप का प्रत्युपकार करना चाहते हैं क्योंकि उपकार करने वाले का उपकार करना सनातन धर्म है। हे कपिश्रेष्ठ, मेरा भी तुम्हारे साथ कुछ सम्बन्ध है जो तीनो लोकों में प्रसिद्ध है। तुम देवताओं में श्रेष्ठ महात्मा पवनदेव के पुत्र हो। तुम्हारी पूजा करना मानो पवनदेव की पूजा करना है। अतः तुम मेरे भी पूज्य हो। इसके अतिरिक्त तुम्हारे पूज्य होने का एक और भी कारण  है उसे सुनो। हे तात ! प्राचीनकाल में सतयुग में सभी पहाड़ों के पंख हुआ करते थे। वे पंखधारी पहाड़ गरुड़ जी की तरह बड़े वेग से चारो तरफ उड़ा करते थे। पर्वतों को उड़ते देख देवता, ऋषि तथा अन्य प्राणी उनके अपने ऊपर गिरने की आशंका से डर गए। तब हज़ार नेत्रों वाले इंद्र ने कुपित होकर अपने वज्र से इधर उधर घूमने वाले हज़ारों पहाड़ों के पंख काट डाले। जब देवराज इंद्र वज्र उठाकर मेरी ओर आये तब महात्मा पवनदेव ने मुझे सहसा उठा कर खारे समुद्र में फेंक दिया। इस प्रकार उन्होंने मेरे समस्त पंखों की रक्षा की।हे पवननंदन !तुम्हारे साथ मेरा यही सम्बन्ध है। तुम एक तो मेरे पूज्य पवनदेव के पुत्र हो दूसरे कपियों में मुख्य और बड़े गुणवान होने के कारण मेरे मान्य हो, अतः मैं तुम्हारी पूजा करता हूँ। तुम्हारे ऐसा करने पर मेरी और सागर की प्रीती और भी बढ़ेगी। अतः हे महाकपे तुम अपना श्रम दूर कर, मेरा आतिथ्य ग्रहण कर मुझे प्रसन्न करो।"
                  जब मैनाक ने इस प्रकार कहा तब कपिश्रेष्ठ हनुमान ने कहा,"मैं आपके आतिथ्य से प्रसन्न हूँ, आपने मेरा सत्कार किया। अब आप अपने मन में किसी प्रकार का खेद न करें। एक तो मुझे कार्य की जल्दी है, दूसरे समय भी बहुत हो चुका है और तीसरे मैंने वानरों के सामने यह प्रतिज्ञा भी की है कि मैं बीच में कहीं न ठहरूँगा।"  
                       यह कहकर कपिश्रेष्ठ हनुमान जी ने मैनाक को हाथ से छुआ और हँसते हुए आकाश में उड़ चले। तब तो मैनाक और समुद्र ने हनुमान जी को बड़े प्रतिष्ठा की दृष्टि से देखा, उनको आशीर्वाद दिया और उनका अभिनन्दन किया। हनुमान जी ने आकाश में पहुँच कर मैनाक की ओर देखा फिर विमल आकाश में बिना किसी अवलम्ब के उड़ चले। हनुमान जी का यह दुष्कर कार्य देख कर सभी देवता, सिद्ध और महर्षिगण उनकी प्रशंसा करने लगे।उस समय शचीपति इंद्र स्वर्ण शिखर वाले मैनाक से प्रसन्न होकर गदगद वाणी से बोले,"हे शैलेन्द्र ! मैं तुम्हारे इस कार्य से बहुत प्रसन्न हूँ, तुम्हें अभयवर देता हूँ कि तू अब जहाँ चाहे वहाँ सुखपूर्वक रह सकता है।" इंद्र से अभयदान पाकर मैनाक प्रसन्न हुआ और सुस्थिर हुआ।
                   इस प्रकार महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण के मैनाक -हनुमान संवाद के अनुसार सतयुग में पहाड़ों के पंख हुआ करते थे जिन्हें इंद्र ने अपने वज्र से काट डाला ताकि वे उड़ न सकें और पृथ्वी के प्राणी निर्भय रह सकें। पवनदेव की कृपा से मात्र मैनाक के ही पंख बच पाए। 
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44. मिथिला के लोकप्रिय कवि विद्यापति रचित - गोसाओनिक गीत (Gosaonik Geet) अर्थ सहित

43. पौराणिक कथाओं में शल्य - चिकित्सा - Surgery in Indian mythology

42. सुन्दरकाण्ड के पाठ या श्रवण से हनुमानजी प्रसन्न हो कर सब बाधा और कष्ट दूर करते हैं

41. माँ काली की स्तुति - Maa Kali's "Stuti"

40. महाशिवरात्रि - Mahashivaratri                                


39. तुलसीदास - अनोखे रस - लालित्य के कवि

38. छठ महापर्व - The great festival of Chhath

37. भगवती प्रार्थना - बिहारी गीत (पाँच वरदानों के लिए)

36. सावन में पार्थिव शिवलिंग का अभिषेक




25. भगवती स्तुति। .... देवी दुर्गा उमा, विश्वजननी रमा......

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24. कृष्ण -जन्माष्टमी -- परमात्मा के पूर्ण अवतार का समय। 

23. क्या सतयुग में पहाड़ों के पंख हुआ करते थे?

22. सावन में शिवपूजा। ..... Shiva Worship in Savan  

21. सद्गुरु की खोज ---- Search of a Satguru! True Guru!

20. देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमारों की अद्भुत कथा  ....
(The great doctors of Gods-Ashwinikumars !). भाग - 4 (चिकित्सा के द्वारा चिकित्सा के द्वारा अंधों को दृष्टि प्रदान करना)
19. God does not like Ego i.e. अहंकार ! अभिमान ! घमंड !

18. देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमारों की अदभुत कथा (The great doctors of Gods-Ashwinikumars !)-भाग -3 (चिकित्सा के द्वारा युवावस्था प्रदान करना)

17. देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमारों की अदभुत कथा (The great doctors of Gods-Ashwinikumars !)-भाग -2 (चिकित्सा के द्वारा युवावस्था प्रदान करना)


16. बाबा बासुकीनाथ का नचारी भजन -Baba Basukinath's "Nachari-Bhajan" !

15. शिवषडक्षर स्तोत्र (Shiva Shadakshar Stotra-The Prayer of Shiva related to Six letters)

14. देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमारों की अदभुत कथा (The great doctors of Gods-Ashwinikumars !)-भाग -१ (अश्विनीकुमार और नकुल- सहदेव का जन्म)

13. पवित्र शमी एवं मन्दार को वरदान की कथा (Shami patra and Mandar phool)

12. Daily Shiva Prayer - दैनिक शिव आराधना

11. Shiva_Manas_Puja (शिव मानस पूजा)

10. Morning Dhyana of Shiva (शिव प्रातः स्मरण) !

09. जप कैसे करें ?

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08. पूजा में अष्टक का महत्त्व ....Importance of eight-shloka- Prayer (Ashtak) !

07. संक्षिप्त लक्ष्मी पूजन विधि...! How to Worship Lakshmi by yourself ..!!

06. Common misbeliefs about Hindu Gods ... !!

05. Why should we worship Goddess "Durga" ... माँ दुर्गा की आराधना क्यों जरुरी है ?

04. Importance of 'Bilva Patra' in "Shiv-Pujan" & "Bilvastak"... शिव पूजन में बिल्व पत्र का महत्व !!

03. Bhagwat path in short ..!! संक्षिप्त भागवत पाठ !!         {Listen it in only three minutes on YouTube}

02. What Lord Shiva likes .. ? भगवान शिव को क्या क्या प्रिय है ?

01. The Sun and the Earth are Gods we can see .....




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Wednesday, March 23, 2016

देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमारों की अदभुत कथा (The great doctors of Gods-Ashwinikumars !)-भाग -2 (चिकित्सा के द्वारा युवावस्था प्रदान करना)

देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमार की अद्भुत कथा Part-1 से आगे 

God Ashwinikumar made  many old men young through Ayurveda 

                       अश्विनीकुमार आयुर्वेदिक चिकित्साशास्त्र के परम ज्ञाता थे। अपनी इस विद्या के द्वारा उन्होंने अनेक परोपकार किये।जैसे वृद्ध को युवा बनाना, अंधे को दृष्टि प्रदान करना, शल्य - क्रिया (Surgery) द्वारा कटे अंगों, यहाँ तक कि कटे सर को जोड़ना इत्यादि। सर्वप्रथम  वृद्धों को युवावस्था प्रदान करने की घटनाओं का वर्णन देखें :- 

 च्यवन ऋषि को वृद्ध से युवा बनाया !                    

                          महर्षि भृगु के पुत्र थे च्यवन। तप करना उन्हें बचपन से ही प्रिय था। एक बार उन्होंने नर्मदा नदी के किनारे तप करने की सोची। वैदूर्य पर्वत के पास नर्मदा के तट पर तपस्या प्रारम्भ की। तपस्या में वे इतने एकाग्र और लींन हो गए कि सूखी लकड़ी जैसे लगते थे। इस कारण उनके पूरे शरीर पर दीमकों ने अपना घर बना लिया। लगता ही नहीं था कि वहाँ कोई मनुष्य है। कुछ ही दिनों बाद वहाँ शर्याति नाम के राजा अपने सैनिकों एवं सुरक्षाकर्मियों के साथ विश्राम करने आये। राजा हर प्रकार से सुखी थे किन्तु उन्हें एकमात्र पुत्री सुकन्या के शिवा और कोई संतान न थी। सुकन्या अतिसुन्दर शालीन लड़की थी। वह भी उनके साथ आई थी। जंगल में सखियों संग खेलती वह तप कर रहे च्यवन ऋषि के आस पास पहुँची। उसकी मधुर आवाज सुनकर ऋषि की एकाग्रता भंग हो गई। दीमक की बाम्बी के अंदर से उन्होंने उसे देखा तो आकर्षित हो गए। ऋषि ने सुकन्या को पुकारा किन्तु उनकी क्षीण आवाज उस तक पहुँच नहीं सकी। खेलते कूदते सुकन्या ने दीमक की बाम्बी देखी तो कुतूहलवश पास पहुँची। बाम्बी के अंदर दो चमकती वस्तुएं देख उसने कांटे उनमे डाल दिए। आँखे बिंध जाने से पीड़ावश ऋषि कराह उठे। थे वे बड़े क्रोधी स्वाभाव के पर प्रेमवश सुकन्या को तो उन्होंने कुछ नहीं कहा किन्तु क्रोध में ऐसा प्रभाव उत्पन्न किया कि राजा की सेना के मल -मूत्र बंद हो गए। सैनिक पीड़ा से कराहने लगे। राजा शर्याति को पता था कि च्यवन ऋषि आस -पास ही कहीं तपस्यारत हैं। वे समझ गए कि जरूर किसी ने उनका अपराध किया है। पूछ ताछ करने पर सुकन्या ने दीमक की बाम्बी की घटना सुनाई। राजा वहां गए। ऋषि को दीमक की मिटटी के बीच देखा और उनसे पुत्री के अपराध के लिए क्षमा मांगी। उनसे सैनिकों को कष्टमुक्त करने का अनुरोध किया। ऋषि मान तो गए पर इस शर्त के साथ कि राजा अपनी कन्या का विवाह ऋषि से करें। राजा किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए पर प्रजा की भलाई के लिए सुकन्या तैयार हो गयी। 

                      ऋषि के प्रसन्न होते ही सेना कष्टमुक्त हो गयी। राजा सेना सहित अपनी राजधानी चले गए। सुकन्या पति सेवा में लींन हो गयी। सेवा और प्रेम के प्रभाव से धीरे धीरे ऋषि स्वस्थ होने लगे। इधर देव वैद्य  रोगी मनुष्यों को खोज कर उन्हें स्वस्थ कर रहे थे। संयोगवश वे च्यवन ऋषि के आश्रम के पास से गुजरे और रूपवती सुकन्या को देखा। उन्होंने उससे परिचय पूछा। सुकन्या उस समय स्नान कर लौट रही थी। उसने अपना, पति और पिता का नाम उन्हें बताया। अश्विनीकुमारों ने कहा कि तुम अप्रतिम सुंदरी हो। ऐसे बूढ़े पति के साथ क्यों हो जो तुम्हें कोई सुख नहीं दे सकता, तुम हममें से किसी एक को पति चुन लो। सुकन्या ने कहा आप मेरे बारे में उचित नहीं सोच रहे। मैं अपने पति में पूरी निष्ठा रखती हूँ और प्रेम करती हूँ। ऐसे वचन सुन अश्विनीकुमार  प्रभावित हुए और कहा हम देव वैद्य हैं।  तुम्हारे पति को पूर्णतः स्वस्थ एवं अपने जैसा सुन्दर और युवा बना देंगे तब तुम हम तीनो में से किसी एक को अपना पति चुन लेना।यदि यह शर्त स्वीकार हो तो अपने पति को यहाँ ले कर आओ। 

                सुकन्या ने यह बात अपने पति को सुनाई। वे देव वैद्य अश्विनीकुमारों के प्रभाव को जानते थे। यौवन एवं सौंदर्य पाने का प्रस्ताव वे अस्वीकार न कर सके। सुकन्या के साथ वे अश्विनीकुमारों के पास पहुंचे।अश्विनीकुमारों ने ऋषि को पहले जल के अंदर प्रवेश कराया। फिर थोड़ी देर बाद स्वयं भी जल के अंदर चिकित्सा करने उतरे।तीन घंटे बाद चिकित्सा पूर्ण होने पर तीनो जल से बाहर आये। ऋषि च्यवन बिलकुल अश्विनीकुमारों के समान तरुण, स्वस्थ एवं सुन्दर हो चुके थे और यह कहना कठिन था कि उनमे से ऋषि कौन थे।उन्होंने कहा हम तीनों में से किसी एक को अपना पति चुन लो। अब सुकन्या के परीक्षा की बारी पुनः आई। कुछ देर तक चुप तीनो को निहारती रही। अंत में पातिव्रत धर्म ने उसका साथ दिया और अपने पति को पहचान कर चुन लिया। ऋषि च्यवन ने स्वास्थ्य, यौवन, सुंदरता और पतिव्रता पत्नी पायी। उन्होंने अश्विनीकुमारों का उपकार मानते हुए कहा कि वे यज्ञ में देवराज इन्द्र के सामने ही अश्विनीकुमारों को सोमरस पान का अधिकारी बनायेंगे।

अश्विनीकुमारों को सोमरस पान का अधिकारी बनाना  

जब राजा शर्याति को पूरी घटना का पता चला तो तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए और पुनः पुत्री के पास च्यवन ऋषि के आश्रम पर परिवार और सुरक्षाकर्मियों के साथ आये। सुकन्या की माता ख़ुशी से पुत्री के गले मिल रो पड़ी। ऋषि च्यवन भी उनलोगों से मिल प्रसन्न थे। राजा को कई कथाएँ सुनाई। फिर कहा राजा मैं आपसे यज्ञ कराऊंगा, यज्ञ की तैयारी करें। नियत समय पर यज्ञ आरम्भ हुआ। देवताओं का आवाहन किया गया। ऋषि ने अश्विनीकुमारों को सोमरस पान की तयारी की। इन्द्र वहीं बैठे थे।उन्होंने वैद्यवृत्ति होने के कारण अश्विनीकुमारों को सोमरस पान का अधिकारी नहीं माना और ऋषि को ऐसा करने से मना किया। 

Sketch: Courtesy - Rahul Mishra

                  ऋषि ने कहा कि ये भी देवता हैं, रूप -गुण में सबसे बढ़कर हैं और कितनो का ही उपकार किया है फिर ये कैसे अधिकारी नहीं। इंद्र ने कहा ये मनमाना रूप धर कर मनुष्यों के बीच फिरते हैं और चिकित्सा का कार्य करते हैं इसलिए ये अधिकारी नहीं। पर ऋषि भी अपनी बात पर अड़े रहे और इंद्र की अवहेलना कर अश्विनीकुमारों को देने के लिए सोमरस उठाया। इंद्र ने हाथ में वज्र उठाकर कहा यदि तुम मेरी अवहेलना कर इन्हें सोमरस दोगे तो मैं तुमपर वज्र से प्रहार करूँगा। ऋषि ने वज्र वाले इंद्र के हाथ को हवा में ही स्तंभित (Fix) कर दिया और मन्त्रों का उच्चारण करते हुए अश्विनीकुमारों के लिए हवन कुण्ड में सोमरस की आहुति दे दी। फिर अपनी तपस्या के बल से हवनकुंड से ही एक भयानक "कृत्या" नाम की शक्ति उत्पन्न की जो देखने में अत्यंत विशाल और डरावनी थी। वह इंद्र को मारने के लिए दौड़ी। इंद्र डरकर ऋषि से बोले, ''आप क्रोधित न हों, आज से ये दोनों ही अश्विनीकुमार सोमरस के अधिकारी होंगे। मैंने तो ऐसा इसलिए किया की दुनिया आप की शक्ति को जाने और सुकन्या एवं राजा शर्याति की ख्याति फैले। आप प्रसन्न हों। " इंद्र की बातों से ऋषि का क्रोध शांत हुआ। उन्होंने कृत्या को वापस किया और देवराज इंद्र को मुक्त किया। 

             अश्विनीकुमारों द्वारा युवावस्था प्रदान करने की अन्य कथा पढ़ें अगले ब्लॉग में।                      

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39. तुलसीदास - अनोखे रस - लालित्य के कवि

38. छठ महापर्व - The great festival of Chhath

37. भगवती प्रार्थना - बिहारी गीत (पाँच वरदानों के लिए)

36. सावन में पार्थिव शिवलिंग का अभिषेक




25. भगवती स्तुति। .... देवी दुर्गा उमा, विश्वजननी रमा......

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24. कृष्ण -जन्माष्टमी -- परमात्मा के पूर्ण अवतार का समय। 

23. क्या सतयुग में पहाड़ों के पंख हुआ करते थे?

22. सावन में शिवपूजा। ..... Shiva Worship in Savan  

21. सद्गुरु की खोज ---- Search of a Satguru! True Guru!

20. देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमारों की अद्भुत कथा  ....
(The great doctors of Gods-Ashwinikumars !). भाग - 4 (चिकित्सा के द्वारा चिकित्सा के द्वारा अंधों को दृष्टि प्रदान करना)
19. God does not like Ego i.e. अहंकार ! अभिमान ! घमंड !

18. देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमारों की अदभुत कथा (The great doctors of Gods-Ashwinikumars !)-भाग -3 (चिकित्सा के द्वारा युवावस्था प्रदान करना)

17. देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमारों की अदभुत कथा (The great doctors of Gods-Ashwinikumars !)-भाग -2 (चिकित्सा के द्वारा युवावस्था प्रदान करना)


16. बाबा बासुकीनाथ का नचारी भजन -Baba Basukinath's "Nachari-Bhajan" !

15. शिवषडक्षर स्तोत्र (Shiva Shadakshar Stotra-The Prayer of Shiva related to Six letters)

14. देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमारों की अदभुत कथा (The great doctors of Gods-Ashwinikumars !)-भाग -१ (अश्विनीकुमार और नकुल- सहदेव का जन्म)

13. पवित्र शमी एवं मन्दार को वरदान की कथा (Shami patra and Mandar phool)

12. Daily Shiva Prayer - दैनिक शिव आराधना

11. Shiva_Manas_Puja (शिव मानस पूजा)

10. Morning Dhyana of Shiva (शिव प्रातः स्मरण) !

09. जप कैसे करें ?

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08. पूजा में अष्टक का महत्त्व ....Importance of eight-shloka- Prayer (Ashtak) !

07. संक्षिप्त लक्ष्मी पूजन विधि...! How to Worship Lakshmi by yourself ..!!

06. Common misbeliefs about Hindu Gods ... !!

05. Why should we worship Goddess "Durga" ... माँ दुर्गा की आराधना क्यों जरुरी है ?

04. Importance of 'Bilva Patra' in "Shiv-Pujan" & "Bilvastak"... शिव पूजन में बिल्व पत्र का महत्व !!

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