Sunday, November 8, 2026

एक संत जिसे लोकोक्तियों ने मात्र घर का भेदी बना दिया

चित्र गूगल से साभार


       राजपरिवार में जन्म, अति धार्मिक, विधर्मी समाज में रहते हुए भी श्रीराम के प्रति अपार भक्ति, कुमार्ग पर चलने वाले बड़े भ्राता को बार-बार सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने वाले, बड़े भ्राता द्वारा लात मार कर भरी सभा से बाहर करने पर भी बिना क्रोधित होते हुए राज्य का त्याग करने वाले, रिश्तों से ज्यादा धर्मपथ को महत्व देने वाले ऐसी आत्मा जिनके बारे में स्वयं श्री राम ने कहा, 

तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें।

अर्थात तुम जैसे संत ही मुझे सबसे अधिक प्रिय हैं। मैं किसी और कारण से शरीर धारण नहीं करता हूँ, बल्कि संतों और भक्तों के प्रेम के कारण ही मेरा अवतार होता है। ऐसे उच्च कोटि के संत हैं विभीषण । किन्तु विडंबना यह है कि इनके बारे में समाज में ये मुहावरे प्रचलित हैं -"घर का भेदी, लंका ढाहे।" कोई निजी स्वार्थ में भी अपने परिवार का भेद उजागर करता है तो उसे विभीषण बोल कर नीचा दिखाया जाता है। जबकि न तो विभीषण ने अपने स्वार्थ के लिए रावण का त्याग कर राम का पक्ष लिया था और न ही अपने मन से उन्होंने लंका त्याग किया था। उन्होंने हर संभव कोशिश की कि रावण माँ सीता को श्रीराम को लौटा दे और क्षमा माँग ले। श्री राम अति दयालु हैं, वे क्षमा कर देंगे। किन्तु रावण का तो विनाश काल आ चुका था, सो उसकी बुद्धि भी विपरीत हो चुकी थी। अपनी शक्ति के अहंकार में उसे ये नीति की बात बड़ी बुरी लगी। उसने भरी सभा में विभीषण पर चरण-प्रहार करते हुए बुरा-भला कहा, फिर भी विभीषण ने रावण के पैर पकड़ कर कहा कि आप बड़े भाई हैं और पिता सामान हैं। मुझे पीट सकते हैं, बुरा भला कह सकते हैं - मैं बुरा न मानूँगा। पर अधर्म मत कीजिये। 

       तो धर्म पथ पर चलने को विभीषण ने भ्राता द्वारा अपमान भी स्वीकार किया और सबके सामने कहा कि अब मैं रघुबीर की शरण में जा रहा हूँ। फिर लंका त्याग कर आकाश मार्ग से श्री राम जी से मिलने आये ।आज समाज में विभीषण की छवि एक गद्दार जैसी बना दी गयी है। किन्तु उनकी तुलना मीर जाफर या जयचंद से कदापि नहीं की जा सकती जिन्होंने स्वार्थवश अपने राजाओं से गद्दारी की थी। विभीषण कोई लंका की राजगद्दी पाने के लिए श्रीराम के पक्ष में नहीं गए थे। उन्होंने अपने उच्च कुल की मर्यादा को ध्यान में रखते हुए सीता-हरण को गलत बताया और रावण को सही मार्ग दिखलाया जो उसने नहीं माना। 

    विभीषण ऐसे संत हैं जो अष्ट-चिरंजीवी में आते हैं अर्थात जिन्हें कलियुग के अंत तक अमरता का वरदान प्राप्त है। हनुमानजी और परशुराम जी की तरह। किन्तु आज ऐसे संत की छवि समाज में मात्र एक घर का भेदी जैसा बना दिया गया है। उनकी सारी अच्छाइयों को नगण्य कर दिया गया। हमें बस एक सीधी सी बात याद रखनी चाहिए कि भगवन श्रीराम उनके बारे में क्या सोचते थे ? जैसा कि प्रारम्भ में चौपाई में लिखा है कि भगवान ने कहा, तुम जैसे संत और भक्तों के लिए ही मैं अवतार लेता हूँ। तो संत विभीषण के प्रति हमें भी वही सोच रखनी चाहिए जो भगवान श्रीराम का था। विभीषण जैसे सन्त, भक्त और धर्म के पथ पर चलने वाले व्यक्ति के लिए हमारे हृदय में आदर सम्मान होना चाहिए।

   जय श्री राम 🙏 🙏 

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